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आज की एक और कडवी सच्चाई

जैन समाज में आज दो चीजें अधिक रुप से देखने मिल रही है एक तो आडम्बर और दुसरा बिना सोच समझ क्रिया के पीछे दौड। आज पुरुषों आडम्बर के पीछे दौड रहे हैं तो महिलाएं क्रिया के पीछे भाग रही है। कोई उपधान के लिए तो कोई वरसीतप के लिए तो कोई ओली के लिए तो कोई चोमासा के लिए तो कोई छरि पालक के लिए अपने बच्चे अपने पति अपने परिवार को छोड़कर भाग म भाग करती रहती है। अरे इनमें से कइओ को तो नवकार का भी अर्थ या विवेचन पता नहीं होता। अपनी प्रशंसा हेतु या देखा-देखी में या शरम के कारन बस भाग रही है। किसी को जैन धर्म के महान तत्वज्ञान के बारे में या आध्यात्मिकता के बारे में कोई जानकारी या ज्ञान लेने में रुचि ही नहीं और ईसीलिये सारी भागदौड़ के बाद भी आत्म परिवर्तन या स्वभाव परिवर्तन नहीं आता। जैन धर्म में भाव का जितना महत्व है उतना किसी भी धर्म में नहीं है। यहां तो कसाई तक को मोक्ष प्राप्ति के उल्लेख है।आत्मा नु कल्याण का अर्थ ये होता है कि हम हमारे आत्मा को शुद्ध करे हमारे भाव और स्वभाव को बदले लेकिन लोगों ने कुछ अलग ही समझा है इसे। आज कुछ गुरू भगवंतो को भी संख्या का बहोत मोह होता है कि मेरी निश्रा में ईतने लोग ईतने उपासक जमा हुए। कई बार सोने की चेन या अन्य प्रलोभन से भी आकर्षित किया जाता है।
आज जिवन में तनाव बढ़ रहा है तब परिवार में एक-दूसरे से अटैचमेंट बहोत ही जरूरी है। कभी कभी कुछ महिलाएं अपने पति की नाराजगी के बावजूद इन सब के पीछे दौडती रहेती है। आज कई बच्चे हुक्का पार्लर मैं या गलत संगत में घुमते रहते हैं तब एलर्ट रहना भी बहुत जरूरी है। सब से पहले परिवार और ऊस के बाद अन्य बात को स्थान देना चाहिए।
आवश्यक सूत्र आगम में कहा गया है कि अपने शारीरिक बल क्षेत्र काल और परिस्थिति अनुसार ही तप करना चाहिए अन्यथा यह नुकसान करता हैं। ईसी तरह भगवान महावीर की अंतिम देशना उतराधयान मै कहा है कि विनय ही मोक्ष का द्वार है।
सब से पहले अहम मुक्त हो कर सरल और प्रमाणिक बने। किसी को ठेस न पहुंचे ऐसा अपना व्यवहार हो तो और कुछ करने की आवश्यकता ही नहीं।🙏🙏🙏
""""""""आलोचक """""""
              """"सागर के जैन जिद्दी """""""""
उपर का लेख जिसने भी लिखा है  साधुवाद के पात्र है
मगर ये सब कुछ जो भी हो रहा है ईसका जिम्मेदार कोन है,  संघ ही जिम्मेदार है,
क्यो मॅदिरो के ट्रस्टी साधु-संतो की हर बात मान लेते है,
चौमासा करनेवाले साधु कुछ भी कह दे ट्रस्टी बीना सोचे हाॅ भर देते है, कही कही ईनामो की झड़ी लगा लेते है,  फिर ईनाम देने के लिए रूपये चाहिए तब बोलियो की झड़ी,
नाम के लिए लोग कुछ भी करने को तैयार और ट्रस्टी और साधु ईनको और क्या चाहिए,
गर निजी तौर पर कोई किसी ट्रस्टी या साधु के पास चला गया की मुझे कुछ रूपयो की अतिआवश्यकता है, ( जो सही मे होती है  ) तब वही साधु-संत और वही ट्रस्टी जुबान नही खोलते या अनावश्यक ज्ञान बाँटने बैठ जाते है,
मानो उनसे बड़ा ज्ञानी और विचारक धरती पर दूसरा कोई है ही नही  ( और ना कभी होगा  )!
तपस्या करना गलत नही है उसके तौर तरीके गलत हो गये है,
किसी शुभ कार्य मे पैसे खर्च किजिये मगर सलीके से कि किसी और हमारे समाज के मध्यम वर्गीय परिवार को तकलीफ ना हो,
भारत देश के सभी जैन मंदिर के ट्रस्टीओ सै निवेदन है कि साधु-संतो की हर बात मे हा मे हा ना मिलाये और कुछ स्व विवेक से काम ले, ?
सह धन्यवाद .........
विवेक सिल लोग ईस आलेख को आगे से आगे बढाते रहे यही नम्र विनंती

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