*पुण्य की पूंजी खर्चकर पाप का माल मत खरीदो*
*आचार्य श्री विजयराज जी के उद्गार*
राजनांदगांव, नौ सितंबर। प्रज्ञानिधि, विश्ववल्लभ आचार्य श्री विजयराज जी ने कहा कि पुण्य की पूंजी से पाप का माल मत खरीदो। इंद्रियों के प्रति आसक्त मत रहो और मन को वश में करने की क्रिया करो। मन वश में हो गया तो हम शांति पा लेंगे। उन्होंने कहा कि मन के 18 दोषों पर हमारी चिंतन यात्रा चल रही है, अगर हमने इन दोषों को दूर कर लिया तो हम मन को वश में कर लेंगे और शांति व मोक्ष प्राप्त कर लेंगे।
उदयाचल की विजय वाटिका में आचार्य श्री ने मन के 18 दोषों में से 12वें दोष इंद्रियों के प्रति आसक्त रहने का विश्लेषन किया। उन्होंने कहा कि हम पुण्य की पूंजी लुटाकर पाप का माल खरीद रहे हैं और अशांत हो रहे हैं। यही संसारिकता है। हम सब्जी खरीदने जाते हैं तो सब्जी छांटकर खरीदते हैं तो फिर पाप का माल बिना छांटे क्यों खरीद लेते हैं? पुण्य की कमाई लुटाते समय हम यह चतुराई क्यों नहीं दिखाते? तीसरी इन्द्रिय है घ्राणेन्द्रिय। यह इन्द्रिय दुर्गंध को बर्दास्त नहीं करती और सुगंध ही सुगंध चाहती है। सुगंध देने वाला बाद में दुर्गंध देने वाला बन जाता है, यह हम नहीं सोचते।
आचार्य श्री ने फरमाया कि हमने दूध पी लिया और यही दूध भीतर जाने के बाद उल्टी के रूप में बाहर निकल गया तो यह दुर्गंध देने वाला बन जाता है। बाद में कोई चाहे कितना भी पैसा क्यों न दे दे, इसे हम वापस नहीं पीते। परिवर्तन पुद्गलों का स्वभाव है। जो पुद्गल हमें पहले प्यारा लग रहा था, वही बाद में कैसे अप्रिय हो गए? उन्होंने कहा जब इंद्रियों के साथ राग-द्वेष जुड़ जाता है तो हम अशांत हो जाते हैं। दुर्गंध और सुगंध मेें समभाव बनाए रखा तो हमने इन्द्रियों को जीत लिया। ये इन्द्रियां राग-द्वेष में न हो तो हम इन्द्रियों को जीत लेंगे। जिसने मन को समझ और समझा दिया तो वो कभी भी पुण्य की पूंजी खर्च कर पाप का माल नहीं खरीदेगा। हम स्वयं के दोष को स्वीकार न कर दूसरों पर दोष मढ़ते हैं और अपने पाप को बढ़ाते हैं।
आचार्य श्री ने कहा कि पुण्य की पूंजी से धर्म का माल खरीदिये। कभी भी कोई पुद्गल एक जैसा नहीं रहता। क्षण-क्षण बदलते इन पुद्गलों के परिवर्तन में सत्य की पहचान करें। अगर परिवर्तन को समझ लेते हैं तो दुर्गंध हो या सुगंध हो, सबमें हमारा समभाव रहता हैं। हम ऊपर ही ऊपर गंध ले लेते हैं, यदि सत्य को पहचान लें तो फिर दुर्गंघ या सुगंध के प्रति राग-द्वेष नहीं रहता। अगर हम सत्यदर्शी बन जाये तो हम अपने आप में स्थिर हो जायेंगे और मन शांत हो जायेगा।
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पुण्य की पूंजी खर्चकर पाप का माल मत खरीदो* *आचार्य श्री विजयराज जी के उद्गार*
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